बिना नमक का पराठा।
आज बड़ा अशांत था चित्त, बड़े मौसा जी के निधन की ख़बर से आहत था। अभी छोटी मामी ने फ़ोन पर बताया ये दुखद समाचार। कितना कष्टकारी होताहै अपनोंका साथ छूट जाना। सब बहुत दुखी थे।बड़ी मामी और चारों मामाओं का रो रोकर बुरा हाल था। आगरा दूर था सबने मिलकर टैक्सी कर ली। रास्ते भर माहौल ग़मग़ीन रहा।छोटी मामी का उपवास भी था। वहां मौसी पीहर से आने वाले उन कांधों की प्रतीक्षा में थीं जिन पर सिर धर कर रो सकें। आगरा पंहुचते पंहुंचते दुख कम पड़ने लगा कदाचित। सभी के चेहरे अब थकान और दुख को ढ़ोने लगे।तय किया गया मौसी के घर जाने से पहले बीच वाले मामा के घर, जो कि आगरा में मौसी के घर से कुछ पहले था वहां रुका जाये। दुख थोड़ी और प्रतीक्षा कर लेगा। सभी उतर गये चैन की साँस ली,मुझे हर हाथ में एक खंजर दिख रहा था जो संवेदनाओं की हत्या करने के लिए उठ चुका था।कुछ ने आराम किया कुछ ने कहा भूख लगी बहू से कह के बनवाओ कुछ। भोजन किया गया।सबसे छोटी मामी बहुत ग़मग़ीनथीं।उनसे कहा गया कुछ खा लो।मुझे लगा वो नहीं खा पाऐंगीं उनकी आत्मा गवारा नहीं कर रही थी।मैं छज्जे को देख रही थी मजबूर थी जाना तो सभी के साथ था। मौसी की प्रतीक्षा का क्या होग...